Sakshiyoga

साक्षीयोग

साक्षी क्या है       आप कौन हैं      साक्ष्य की कला      स्वयं को प्रेम करें

आपकी भावनाएं      स्वयंता ही साक्षात्कार

जीवन और इसकी चुनौतियों से निपटने के बारे में कई विचार और विधियाँ अरसों से चले आ रहें हैं। साथ ही साथ हर युग में जीवन के परम उद्देश्य के बारे में भी वैविध्यतापूर्ण विचारधाराएँ प्रवर्तित होती रहती हैं।

उनमें से ज्यादातर कुछ न कुछ करने पर जोर देतें हैं।

यदि आप कुछ कर नहीं रहे हैं तो आपको मानो अपनी हयाती का एहसास नहीं होता।

अपने अस्तित्व की सार्थकता महसूस करने के लिए आपको लगता है कि आपको कुछ तो करना ही चाहिए।

आपको ऐसा लगता हैं की बिना कुछ किये और कुछ करने लिए सोचे बिना आप हालत का हल नहीं निकाल रहें।

शारीरिक या मानसिक रूप से कुछ न कुछ करने की आपकी प्रकृति है।

जब आप मानते हैं कि आपका अस्तित्व इस मानव जीवन की तरह क्षणजीवी है तब आपका अहंकार इस धरती पर हमेशा के लिए अपने अस्तित्व के पदचिन्हों की विरासत छोड़ने के लिए कदम उठाता है, या तो फिर उसे लगता है की वह ऐसा कर पायेगा।

कुछ करने से आप का अहंकार आपके अस्तित्व, आपकी उपस्थिति, आपकी योग्यता और आपके महत्व के बारे में आश्वस्त हो जाता है।

आप भूले-बिसरे होना पसंद नहीं करते। इसलिए तो आप भौतिक या आध्यात्मिक उपलब्धियाँ हासिल करने में जी जान लगा देते हैं।

कुछ करने का नाम ही तो अहंकार है।

जो आप हैं उसकी अनुभूति ही तो मुक्ति है।

कुछ करना वो सांसारिक विकार  है।

होना मतलब इस असीम अस्तित्व से युति।

कुछ करना मतलब विभाजन।

स्वयंता ही, होना ही,  है परम पूर्णता।

साक्षी बनें। साझी नहीं।

निरीक्षण करें। जुड़ें मत।

कोई भी कार्य करने से पहले आप इसे आंकते हैं।

आंकना (judging) अहंकार की औलाद है।

कुछ भी आंकने में हमेशा आपकी संस्कृति, विश्वास, शिक्षा, विचारों और झुकाव की असर अहमियत रखती है।

आंकने में आपके मिलावट के रंग भरे होते है।

आप कोई काम पसंद करने से पहले या किसी विचार का पक्ष लेने से पहले उनका विश्लेषण करते हैं।

विश्लेषणमात्र अपूर्ण है।

किसी का भी विश्लेषण, आंकन, निर्णय करने से और उसे छानने से आप या तो उसका स्वीकार करते हो या इन्कार।

छानो मत।

सब कुछ अखण्ड पूर्णरूप से बहने दो।

केवल निरीक्षण करें।

सिर्फ साक्षी बने रहें।

आप जो और जैसे हैं  इसमें न तो कुछ जोड़े न तो उसमें से कुछ दूर करें।

बस, आप स्वयं को, अपने कार्यों को और विचारों को जैसे हैं वैसे ही देखें।

जो आप बाधा नहीं डालेंगे तो आप, आपके विचार, आपके कार्य और यह  संपूर्ण अस्तित्व एक बन जाएगा।

बस, केवल निरीक्षण करें।

स्वीकार कर या त्याग कर कुछ भी करना दासत्व, गुलामी, है।

होना ही मुक्ति है।

यही वास्तविक स्वतंत्रता, अखंड ऐक्य और समस्त पूर्णता की अवस्था है।

दुनिया में सब कुछ हमेशा बदलता रहता है।

सिद्धांत बदलते हैं।

विचारधारा बदलती हैं।

अच्छे और बुरे, शुभ और अमंगल, पाप और पुण्य की परिभाषाएं बदलती हैं।

वे आपकी अवधारणाओं और प्राथमिकताओं के अनुसार बदलते हैं।

यहां तक ​​कि एक ही युग में भी जो किसी के लिए अच्छा, नैतिक और पवित्र है, वही दूसरे के लिए बुरा, अनैतिक और पापमय हो सकता है।

ये सभी मतभेद अहंकार के अंकुर हैं।

अहंकार अज्ञान से उत्पन्न होता है।

सब कुछ बदलता है लेकिन आपका सत्य स्वरूप, “स्वयं आप “, हमेशा अपरिवर्तनीय है यह वास्तविकता को नहीं जानना उसका नाम ही अज्ञान है ।

असली “आप” किसी भी बदलाव में शामिल नहीं है।

वह अनासक्त रहता है क्योंकि असली “आप” हमेशा सब कुछ का केवल साक्षी बना रहता है।

जब आप अस्तित्व के साक्षी होते हैं तो आप अस्तित्व के साथ, वास्तविक “आप” के साथ, समरस हो जाते हैं ।

सभी घटनाएं केवल एक खेल हैं। एक भ्रम, जो आपके स्वयं की अनुपस्थिति के ख़याल  से पेश हुआ है।

एकमात्र मार्ग है स्वयंता,  आप स्वयं का होना।

एकमात्र मार्ग है साक्षी होना।

एकमात्र मार्ग है कोई मार्ग नहीं चुनना।

एकमात्र मार्ग है किसी भी या कई पथों पर नहीं चलना।

एकमात्र मार्ग है कि कुछ भी न करें, केवल स्वयं में स्थित रहें।

केवल साक्षी रहें।

 

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